Agro-Forestry 

The Principal Chief Conservator of Forest (PCCF) of Madhya Pradesh, while addressing the staff of the State Forest Research Institute (SFRI) during his visit said that, in today’s socio-economic and environmental context, it is necessary to do research on how to ensure the fulfillment of the basic needs of farmers, generation of employment opportunities, protection of the environment, natural resource management and sustainable production from farmlands without damaging the agricultural economy. Soon after, the agro-forestry division was established at SFRI on 1st of March 2016 at the hands of the director of the institute.

Mandate

1. Documentation of existing agro-forestry systems for different agro-climatic condition.
2. Impact assessment of agro-forestry technologies on natural resource management and livelihoods. 
3. Study of social, anthropological and economic issues of agro-forestry. 
4. Strengthening agro-forestry database development programme and to serve as a repository of information.
5. Socio-economic study in various fields.

 

Institutional Staff

Name Shri B.P. Bathma
Designation Assistant Director
Qualification M.Sc. (Mathematics)
Email address

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Experience  20 Years in the field of forestry 
Contact number 9425183463
Name: Dr. Ganga Sharan Mishra
Designation: Senior Research Officer and Head
Education: L.L.B., M.A. (Business Economics), M. Lib. Science Ph.D.(Buss. Eco.)
Experience: 21 years
Mobile: 9425384810, 7000943819
Email: This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it.

Research Experience

He joined the institute in 1997 and now heads Agro-forestry Branch at State Forest Research Institute, Jabalpur. he has completed Ph. D. degree in geen revoluation of agricultural species in Rewa division in 1992. he has  undertaken  Research projects on tribals, economic potential of NTFPs, their marketing and processing  He has undertaken micro and macro level Socio economic study of important medicinal plants and their impact on tribal economy. He has also been part of the SFRI monitoring and evaluation projects of number of schemes like SGSY- Bamboo, medicinal plants for NMPB and FDA in Madhya Pradesh. He has undertaken study on Agro-forestry research, economics of medicinal plants and forestry species in all Agro Claimatic zones in M. P. level plantations. He has undertaken study on quantification of important gume production in Madhya Pradesh.

 

Research

Ongoing Projects

Title of the Project

Name of PI

Source of funding

Sanctioned Amount
(Rs.)

Date of Initiation

Due Date of compilation

मध्यप्रदेश में प्रमुख गोंदों के संग्रहण के आॅकड़ों का संकलन एवं प्राथमिक संग्राहकों पर सामाजिक आर्थिक प्रभाव परियोजना के अंतर्गत प्रचार-प्रसार मार्गदर्शिका एवं पुस्तक का प्रकाशन डाॅ. जी. एस. मिश्रा अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (अनुसंधान, विस्तार एवं लोक वानिकी), भोपाल, मध्यप्रदेश

1.00 लाख

Jan.  2018

Dec. 2018

 

Completed Projects

Title of the Project

Name of PI

Objective

Funding
 

Date of compilation

मध्यप्रदेश में बल्ली एवं जलाऊ काष्ठ की समस्या के समाधान में क्लोनल यूकेलिप्टस के रोपण की भूमिका का अध्ययन। डाॅ. जी. एस. मिश्रा चयनित जिले में पहले से लगे सिंचित एवं असिंचित क्लोनल यूकेलिप्टस रोपण का अध्ययन एवं सिचित/असिंचित तथा वर्षा आधारित रोपणों के लिए उपयुक्त माॅडल्स का विकास। 

अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (विकास), भोपाल, मध्यप्रदेश 

2010

मध्यप्रदेश में निजी एवं राजस्व क्षेत्रों में वानिकी प्रसार हेतु विभिन्न प्रकार के कृषि जलवायु एवं मिट्टियों में प्राप्त हो सकने वाली वनोपज का आर्थिक विश्लेषण। डाॅ. जी. एस. मिश्रा
  • वानिकी प्रसार हेतु जलवायु एवं मिट्टी के अनुसार कृषकों के सफल वृक्षारोपणों का अध्ययन।
  • कृषकों की पड़ती तथा कृषि के लिये अनुपयुक्त भूमि में उगाई जा सकने वाली वृक्ष एवं औषधीय प्रजातियों का अध्ययन।
अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (अनुसंधान, विस्तार एवं लोक वानिकी), भोपाल, मध्यप्रदेश 2014  
मध्यप्रदेश में प्रमुख गोंदों के संग्रहण के आॅकड़ों का संकलन एवं प्राथमिक संग्राहकों पर सामाजिक आर्थिक प्रभाव डाॅ. जी. एस. मिश्रा   अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (अनुसंधान, विस्तार एवं लोक वानिकी), भोपाल, मध्यप्रदेश 2018

महत्वपूर्ण उपलब्धियां

सेवाकाल के दौरान कई परियोजनाओं का नेतृत्व किया एवं कुछ परियोजनाओं में सहयोगी के रूप में कार्य करते हुए पूर्ण किया, जिनका सेक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है।

1. सामाजिक-आर्थिक एवं विपणन शाखा में कार्य (1997-2001)

  • सामाजिक-आर्थिक एवं विपणन शाखा में पदस्थिति के पश्चात् वर्ष 1997-98 वर्ष 2002 तक लघु वनोपज आॅवला (एम्ब्लिका आॅफीसिनेलिस), सफेद मूसली (क्लोरोफायटम बोरीविलिएनम), अचार गुठली (बुकनेनिया लंजन) पर सहयोगी अन्वेषक के रूप में उक्त प्रजातियों के संग्रहण, प्रसंस्करण, श्रेणीकरण एवं विपणन से संबंधी अध्ययन किया। प्रधान अन्वेषक के रूप में भिलावा (सेमेकार्पस एनाकार्डियम) पर सूक्ष्म एवं विस्तृत अध्ययन किया जिसे वर्ष 2000 में बुलेटिन (43) के रूप में प्रकाशित किया गया। 
  • वर्ष 2001 में विपणन सूचना पद्धति के अंतर्गत लघुवनोपज प्रजातियों की बाजार कीमत से संग्राहकों को उनके परिश्रम की उचित कीमत मिले, इसके लिए सहयोगी अन्वेषक के रूप में मध्यप्रदेश की एकमात्र लघुवनोपज प्रजातियों की बाजार कीमत की जानकारी देनेवाली पत्रिका वन-धन के प्रकाशन में संयुक्त सम्पादक की भूमिका निभाई।
  • सामाजिक आर्थिक शाखा में सेवा देते हुए मापिकी शाखा के अंतर्गत प्रदेश के विभिन्न वनमंडलों में डाले गये सेम्पल प्लाट के मापन का विधिवत प्रशिक्षण प्राप्त कर दक्षता पूर्वक मापन कार्य पूर्ण किया।

 2 . जैव विविधता शाखा में कार्य (2002-2009)

  • औषधीय प्रजातियों की खेती में संलग्न कृषकों (रीवा जिले के संदर्भ में) का सामाजिक आर्थिक सर्वेक्षण कर औषधीय प्रजातियों के उत्पादन, प्रसंस्करण, व्यापार एवं कृषकों को प्राप्त होने वाली आय व रोजगार का अध्ययन किया एवं प्रतिवेदन से शासन को अवगत कराया गया।
  • औषधीय प्रजाति गुड़मार की कृषि तकनीक का विकास, स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना के अंतर्गत बाॅस रोपण से प्राप्त आय व रोजगार का अध्ययन, प्रदेश में औषधीय प्रजातियों की उपलब्धता एवं संग्रहण, औषधीय प्रजातियों की खेती में संस्थान द्वारा आयोजित प्रशिक्षण आदि कार्यो में कार्य किया।
  • औषधीय पादप बोर्ड नई दिल्ली से औषधीय पौधों की खेती के लिये अनुदान प्राप्त करने वाले प्रदेश में 30 जिलों के (5 प्रतिशत) कृषकों का प्रधान अन्वेषक के रूप में अनुश्रवण मूल्यांकन कार्य पूर्ण कर प्रतिवेदन म.प्र. राज्य लघुवनोपज सहकारी संघ को (2006-07 में) प्रस्तुत किया। इसके फलस्वरूप पुनः प्रदेश के धार जिले के 100 प्रतिशत कृषकों के अनुश्रवण मूल्यांकन का कार्य पूर्ण कर प्रतिवेदन सौपा। इसके अतिरिक्त वन विकास अभिकरण के मूल्यांकन की दक्षता प्राप्त कर विभिन्न वन मंडलों के रोपण कार्यो का मूल्यांकन कार्य पूर्ण किया। इसके अतिरिक्त साल के पुनरुत्पादन का अध्ययन किया।
  • मध्यप्रदेश के महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक पादप के अंग्रेजी संस्करण को परिष्कृत एवं परिमार्जित करते हुए 156 प्रजातियों से बढ़ाकर 190 प्रजातियों का हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत कर जन साधारण के लिए लोकोपयोगी सवरूप (2005ें) में प्रस्तुत किया।

3. प्रचार-प्रसार शाखा में कार्य (2010)
      अपर संचालक एवं मुख्य वन संरक्षक श्री आर. पी. सिंह साहब के मार्गदर्शन में कृषि वानिकी से सम्बन्धित परियोजना क्लोनल यूकेलिप्टस का सूक्ष्म अध्ययन कर प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।

4. सामाजिक-आर्थिक एवं विपणन शाखा में कार्य (2011-2016)

  • पुनः सामाजिक आर्थिक शाखा में पदस्थापना होने के पश्चात् प्रदेश के विभिन्न वनमंडलों में एफ.डी.ए. का मूल्यांकन एवं मध्यप्रदेश के 11 कृषि जलवायु क्षेत्र के प्रत्येक जिले में जी भूमि पर रोपित वृक्ष एवं औषधीय प्रजातियों के कृषकों का प्रारंम्भिक सर्वेक्षण कर डेटा बेस तैयार किया इसके उपरांत सामाजिक आर्थिक सर्वेक्षण के माध्यम से कृषकों के रोपण स्थल से वृक्षों का मापन कर प्राप्त होने वाली आय का आॅकलन किया।
  • मध्यप्रदेश के वनों में पाई जाने वाली महत्वपूर्ण गोंद जिनका कि संग्रहण एवं व्यापार के द्वारा आदिवासियों की आय पर सीधा प्रभाव पड़ता है। प्रदेश में जिलेवार कौन-कौन सी गोद का कितनी मात्रा में संग्रहण किया जाता है, संग्रहण क्षेत्र आदि से संबंधित विस्तृत अध्ययन पूर्ण कर आॅकड़ों के विश्लेषण एवं प्रतिवेदन लेखन का कार्य जारी है। 

 

5. कृषि वानिकी शाखा में कार्य (2016-निरन्तर)

  • मार्च 2016 में गठित शाखा का प्रभार प्राप्त होने के उपरांत पूर्व की चल रही गोंद परियोजना के अध्ययन को जारी रखा गया। साथ ही कृषि वानिकी से जुड़ी स्थलीय व्यावहारिक कठिनाइयों का अध्ययन करने के लिए स्थलीय सर्वेक्षण कर कृषकों से चर्चा द्वारा प्राप्त जटिल तथ्यों के समाधान हेतु परियोजना प्रस्ताव तैयार कर वित्तीय अनुदान हेतु प्रदेश     के केम्पा प्रभारी को माननीय संचालक महोदय के माध्यम से संस्थान द्वारा प्रस्तुत किया गया है।